Blogएक्सक्लूसिव खबरेंप्रशासनमेघालयराष्ट्रीयलेटेस्ट खबरेंवनशिक्षासामाजिकस्वास्थ्य

उमियम झील में रिज़ॉर्ट प्रोजेक्ट पर घमासान, लुम्पोंगडेंग बचाओ आंदोलन तेज

ताज रिज़ॉर्ट प्रोजेक्ट पर घिरी सरकार, द्वीप बचाने की मांग तेज

गोविंद शर्मा,

शिलांग 14 अप्रैल 2026/असम.समाचार

उमियम झील के बीचों-बीच स्थित शांत लुम्पोंगडेंग द्वीप इन दिनों एक बड़े पर्यावरणीय टकराव का केंद्र बन गया है। प्रस्तावित लक्ज़री रिज़ॉर्ट प्रोजेक्ट के खिलाफ विरोध तेज़ होता जा रहा है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह परियोजना मेघालय के सबसे सुंदर प्राकृतिक स्थलों में से एक को स्थायी नुकसान पहुँचा सकती है।

बताया जा रहा है कि मेघालय सरकार ने इंडियन होटल्स कंपनी लिमिटेड को 66 एकड़ से अधिक भूमि सौंपी है। इस परियोजना के तहत 36 एकड़ में फैले लुम्पोंगडेंग द्वीप का विकास और 30 एकड़ क्षेत्र में ऑर्किड लेक रिज़ॉर्ट का पुनर्विकास प्रस्तावित है।

शुरुआत में सीमित विरोध अब एक बड़े जन आंदोलन में बदल चुका है। ‘लुम्पोंगडेंग बचाओ’ अभियान के तहत नागरिक, पर्यावरणविद और सामाजिक संगठन एकजुट हो रहे हैं। आंदोलन की अगुवाई ग्रीन-टेक फाउंडेशन मेघालय इंडिया कर रहा है।

विवाद का केंद्र लुम्पोंगडेंग द्वीप ही है, जहां पेड़ों की कटाई जैसे संकेतों ने स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है। आंदोलन ने तब नाटकीय रूप लिया जब फाउंडेशन के चेयरमैन एच. बानसियूडोर नोंगलांग ने मल्की मैदान में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। आज उनकी हड़ताल का छठा दिन है और उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही है, बावजूद इसके उन्होंने आंदोलन से पीछे हटने से इनकार कर दिया है।

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि झील के अंदर और आसपास फाइव-स्टार ‘ताज रिज़ॉर्ट और स्पा’ का निर्माण पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। उनका कहना है कि निर्माण कार्य, मिट्टी भराई, शोर-शराबा और गाद जमाव जैसी गतिविधियां झील के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचा सकती हैं। यह झील जलीय जीवों और प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आवास मानी जाती है।

आंदोलनकारी तख्तियों के साथ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जिन पर लिखा है“लुम्पोंगडेंग प्रोजेक्ट रद्द करो।” वहीं, फाउंडेशन के महासचिव रित्रे लिंगदोह ने मुख्यमंत्री कोनराड संगमा के इस आश्वासन पर सवाल उठाए हैं कि द्वीप पर कोई स्थायी ढांचा नहीं बनेगा।

जैसे-जैसे आंदोलन को जनसमर्थन मिल रहा है, यह विवाद एक बड़े सवाल को जन्म दे रहा है—क्या विकास की कीमत पर प्राकृतिक धरोहरों से समझौता किया जाना चाहिए, और इन बेशकीमती संसाधनों का भविष्य तय करने का अधिकार आखिर किसके पास है?

 

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!