नगांव की रातों में ‘हुस्न का फरेब’: बोरघाट से उड़ियागांव तक बिछा हनी ट्रैप का जाल, कारोबारी से लेकर कॉलेज गर्ल्स तक निशाने पर

विकास शर्मा,
नगांव 24 अक्टूबर 2026/असम.समाचार
दिन के उजाले में शांत दिखने वाला नगांव शहर अंधेरा घिरते ही एक खतरनाक दलदल में तब्दील हो जाता है। आधुनिक लाइफस्टाइल, महंगे शौक और रातों-रात अमीर बनने की सनक ने शहर के कुछ सफेदपोश चेहरों को एक घिनौने अपराध की ओर धकेल दिया है। नगांव में इन दिनों एक संगठित हनी ट्रैप सिंडिकेट सक्रिय है, जिसने मीठी बातों, प्यार के फरेब और ब्लैकमेलिंग को बाकायदा एक ‘कमाऊ धंधा’ बना लिया है।
अंधेरे का ‘हॉटस्पॉट’: बोरघाट से उड़ियागांव तक का कॉरिडोर
रात गहराते ही बोरघाट बाईपास से लेकर उड़ियागांव के बीच संदिग्ध गतिविधियां तेज हो जाती हैं। सड़क किनारे रुकती गाड़ियां, मोबाइल पर लगातार होती बातचीत और सुनसान कोनों में खड़े युवा चेहरे,यह सिर्फ सामान्य आवाजाही नहीं, बल्कि शिकार की तलाश होती है।
सूत्रों के मुताबिक, इस गिरोह की युवतियां और युवक बेहद सलीकेदार, पढ़े-लिखे और आधुनिक नजर आते हैं ताकि किसी को शक न हो। सोशल मीडिया से लेकर रियल लाइफ तक, लोगों को पहले बातों के जाल में उलझाया जाता है। इसके बाद रात के सन्नाटे में शिकार को शहर के चुनिंदा होटलों या निजी ठिकानों पर बुलाया जाता है, जहां से शुरू होता है ब्लैकमेलिंग का असली खेल।
कैमरे का खौफ और लाखों की वसूली
हाल ही में सामने आया चर्चित वीडियो कांड इस सिंडिकेट की कार्यप्रणाली की एक बानगी भर है। एक नामी स्थानीय कारोबारी को पहले दोस्ती के बहाने होटल के कमरे में बुलाया गया। वहां सब कुछ पहले से तय स्क्रिप्ट के मुताबिक हुआ—निजी पलों का चुपके से वीडियो रिकॉर्ड किया गया।
अगली ही सुबह शुरू हुआ सौदेबाजी का खेल। युवती के एक करीबी साथी ने कारोबारी को बदनामी और वीडियो वायरल करने की धमकी देकर कथित तौर पर 3 लाख रुपये ऐंठ लिए। लोकलाज के डर से कई लोग पुलिस तक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, और यही चुप्पी इस गिरोह की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है।
प्यार के नाम पर युवतियों का शोषण
इस सिंडिकेट का दूसरा चेहरा और भी ज्यादा रूह कंपाने वाला है। गिरोह के शातिर युवक मासूम और कॉलेज जाने वाली युवतियों को अपने प्रेमजाल में फंसाते हैं। भावनात्मक लगाव बनाकर निजी तस्वीरें और वीडियो हासिल किए जाते हैं, और फिर शुरू होता है मानसिक उत्पीड़न और ब्लैकमेलिंग।
शहर में चर्चा है कि इस भावनात्मक और वित्तीय दबाव को न झेल पाने के कारण एक युवती पहले ही आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा चुकी है। जब शिकार पूरी तरह टूट जाता है या पैसे देने में असमर्थ हो जाता है, तो उसे बेसहारा छोड़कर अगला निशाना तलाश लिया जाता है।
संगठित गिरोह, गहरी पैठ
यह किसी एक-दो मनचलों का काम नहीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से काम कर रहा पूरा नेटवर्क है:
- शिकार की पहचान: गिरोह के कुछ सदस्य शहर के संपन्न व्यापारियों, रसूखदारों और सीधे-सादे युवाओं की रेकी करते हैं।
- सफेदपोश मुखौटा: जाल में फंसाने वाले युवक-युवतियां सामान्य परिवारों और कॉलेज बैकग्राउंड से आते हैं, जिससे सामने वाला आसानी से भरोसा कर लेता है।
- होटल और लॉज का इस्तेमाल: बिना ठोस पहचान पत्रों या मिलीभगत के जरिए घंटों के हिसाब से कमरे बुक किए जाते हैं।
- बिचौलिए और धमकी: वसूली के लिए गिरोह के बाहरी दबंग लड़कों का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि पीड़िता या पीड़ित कानूनी मदद लेने से डरे।
नगांव की सड़कों पर रात के वक्त पसरता यह सन्नाटा अब शहरवासियों के लिए एक चेतावनी बन चुका है। चमक-दमक और सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया के पीछे छिपा यह ‘हनी ट्रैप’ सिंडिकेट न जाने और कितने परिवारों की इज्जत और जिंदगी निगलने की फिराक में बैठा है।
(सूत्र के आधार पर जानकारी)



