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अवैध खनन ने डुबोई रेल की ‘लाइफलाइन’, किराए के ‘डकैतों’ से त्रस्त जनता!

अब सब्र का बांध टूट चुका है। प्रभावित इलाकों के प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया है कि उन्हें अब आश्वासन के 'कागजी पुल' नहीं, बल्कि सिमेन नदी पर लोहे और कंक्रीट का असली पुल चाहिए, और वह भी तुरंत। अगर रेलवे विभाग ने जल्द ही युद्धस्तर पर पुनर्निर्माण कार्य शुरू नहीं किया, तो यह गुस्सा आने वाले दिनों में और उग्र रूप ले सकता है।

राहुल दोले,

सिमेन चापरी (धेमाजी) 9 जुलाई 2026/असम.समाचार

​पहाड़ों से उतरी नदी का गुस्सा या इंसानी लालच का नतीजा? वजह जो भी हो, असम-अरुणाचल सीमा पर स्थित जोनाई का सिमेन नदी रेलवे पुल आज एक बेबस कहानी बयां कर रहा है। गत 28 जून की उस मूसलाधार बारिश ने सिर्फ पुल को नहीं तोड़ा, बल्कि अरुणाचल के पासीघाट से लेकर जोनाई तक के हजारों आम लोगों की ‘लाइफलाइन’ को भी पटरी से उतार दिया है।

​तस्वीर यह है कि आपदा को गुजरे दस दिन हो चुके हैं। मंत्रियों के काफिले आए, रेलवे के बड़े अफसरों ने फाइलें पलटीं, तस्वीरें खिंचवाईं और चले गए। लेकिन जमीन पर? जमीन पर आज भी सिर्फ सन्नाटा पसरा है और पुल के मलबे पर स्थानीय लोगों का आक्रोश उबल रहा है। जोनाई-मुरकोंगसेलेक-गुवाहाटी और डिब्रूगढ़ रेल रूट पूरी तरह ठप पड़ा है, और प्रशासन है कि अभी भी ‘प्लानिंग’ के मोड से बाहर नहीं आ पाया है।

​1. आपदा में ‘अवसर’: जेब पर डाका डाल रहे निजी वाहन

​रेलवे का पहिया क्या थमा, सड़क पर दौड़ने वाले कुछ निजी वाहन चालकों की तो चांदी हो गई। जोनाई से सिलापाथर जाने वाले मजबूर यात्रियों से अब मनमाना किराया वसूला जा रहा है।

  • यात्रियों का दर्द: “ट्रेन का टिकट चंद रुपयों का था, अब मजबूरन जेब खाली करनी पड़ रही है।”
  • जागरूक नागरिकों की मांग: संकट के इस दौर में जिला प्रशासन इन ‘किराए के डकैतों’ पर नकेल कब कसेगा?

​2. ‘लालच’ की नींव पर खड़ा था पुल!

​स्थानीय लोगों का गुस्सा सिर्फ काम में हो रही देरी पर नहीं है, बल्कि उस ‘अवैध धंधे’ पर भी है जिसने इस पुल को खोखला किया।

नदी का रोष या इंसानी भूल?

ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि अरुणाचल सीमा से लगी सिमेन नदी में पिछले कई सालों से धड़ल्ले से अवैध बालू और पत्थर का खनन हो रहा है। इस माफिया तंत्र ने नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बदल दिया। पुल के पाए (नींव) पहले ही कमजोर हो चुके थे, रही-सही कसर तेज बहाव ने पूरी कर दी।

 

​जनता का अल्टीमेटम

​अब सब्र का बांध टूट चुका है। प्रभावित इलाकों के प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया है कि उन्हें अब आश्वासन के ‘कागजी पुल’ नहीं, बल्कि सिमेन नदी पर लोहे और कंक्रीट का असली पुल चाहिए, और वह भी तुरंत। अगर रेलवे विभाग ने जल्द ही युद्धस्तर पर पुनर्निर्माण कार्य शुरू नहीं किया, तो यह गुस्सा आने वाले दिनों में और उग्र रूप ले सकता है।

​देखना यह है कि रेल विभाग की कुंभकर्णी नींद कब टूटती है और जोनाई की जनता को इस ‘सफर के संकट’ से कब आजादी मिलती है।

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