1950 का महाभूकंप देखा, अब 105 की उम्र में 7 दिन सैलाब से लड़ीं: मिलिए असम की जीजिविषा की मिसाल गुणोदा दत्ता से

केशव पारीक,
शिवसागर (असम) 25 अगस्त 2026
जिस उम्र में इंसान सिर्फ स्मृतियों के सहारे जीता है, उस 105 वर्ष के पड़ाव पर आकर शिवसागर के जयसागर सुंदरपुर की गुणोदा दत्ता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि इंसानी हौसले के आगे कुदरत का कहर भी छोटा पड़ जाता है। 1950 के ऐतिहासिक महाभूकंप की गवाह रहीं गुणोदा ने हाल ही में ऊपरी असम में आई विनाशकारी बाढ़ से सीधे सात दिनों तक मोर्चा लिया।
जब सैलाब उनके घर में दाखिल हुआ, तो बचने की कोई राह न देख 105 वर्षीय बुजुर्ग महिला ने घर के भीतर बने एक ऊंचे मचान (तख्त) पर शरण ली। चारों तरफ हिलोरे मारता गंदला पानी, न बिजली और न आने-जाने का रास्ता—इस हाल में वे पूरे सात दिन जिंदगी की उम्मीद बांधे पानी के बीच डटी रहीं।
पेंशन के सहारे जिंदगी, पानी ने छीनी छत
गुणोदा अपने 80 वर्षीय बेटे दिनेश दत्ता, बहू और पोते के साथ रहती हैं। परिवार का गुजर-बसर मुख्य रूप से मिलने वाली वृद्धावस्था पेंशन पर टिका है। बाढ़ का पानी तो उतर गया, लेकिन पीछे छोड़ गया तिनके-तिनके से बने आशियाने का मलबा और गहराता आर्थिक संकट। घर की दीवारें दरक चुकी हैं और जरूरी सामान बह गया है।
सदी से ज्यादा का वक्त देख चुकीं गुणोदा की आंखों में 1950 की जमीन फटने की यादें भी हैं और 2026 के इस सैलाब का दर्द भी। यह कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग महिला के बचने की नहीं, बल्कि असम के बाढ़ पीड़ितों के उस अदम्य साहस की दास्तान है, जो हर साल सब कुछ उजड़ने के बाद भी जीने की नई वजह तलाश लेते हैं।



