पहाड़ों पर विकास की तलाश : अमरेङ्ग की जनता अब भी बांस के पुल और जंगलों के भरोसे

मुकेश चौहान
पश्चिम कार्बीआंगलॉन्ग 11 सितंबर/असम.समाचार
आज़ादी को 77 बरस हो गए, लेकिन पश्चिम कार्बीआंगलॉन्ग के अमरेङ्ग क्षेत्र के गाँव अब भी बांस के पुलों और टेढ़े-मेढ़े जंगल रास्तों पर ही निर्भर हैं। बीते हफ्ते की एक घटना ने इस दर्दनाक हकीकत को फिर सामने ला दिया रोंगमंपी गाँव की महिला चाटी तिस्सोपी को बीमार हालत में ग्रामीणों ने बांस-लकड़ी के सहारे बने अस्थायी स्ट्रेचर पर डालकर घंटों पैदल चलकर जेरिकिन्डिंग अस्पताल पहुँचाया।
यह रास्ता न सड़क है, न पुल। केवल नदियों पर डगमगाते बांस के पुल और चारों ओर घना जंगल। ऐसे हालात में अस्पताल पहुँचना किसी जंग से कम नहीं।
अधूरे वादों का पहाड़
अमरेङ्ग एमएसी क्षेत्र के लोगों का कहना है कि चुनाव आते ही विकास के सपने दिखाए जाते हैं, पर आज तक न सड़क बनी, न पक्के पुल। स्वास्थ्य केंद्रों की हालत भी किसी से छिपी नहीं जहाँ डॉक्टर नहीं, दवाइयाँ नहीं और सर्जरी उपकरण तक नहीं।
नागरिकों की नाराज़गी
रोंगमंपी के सजग नागरिकों ने सरकार पर सीधा सवाल उठाया है
“अगर मरीज अस्पताल तक पहुँच भी जाए तो वहाँ इलाज ही कहाँ मिलता है?” उनका कहना है कि यह इलाका आज़ादी के बाद से अब तक बुनियादी सुविधाओं से वंचित है।
विकास या सिर्फ़ आश्वासन?
लोगों का दर्द यही है कि सरकार और नेताओं की बातें सिर्फ़ आश्वासन तक सिमट जाती हैं, जबकि पहाड़ों में रहने वाली जनता रोज़ अपनी जान जोखिम में डालकर इलाज और जीवन की जद्दोजहद लड़ती है।
हकीकत यही है अमरेङ्ग के इन गाँवों में विकास पहुँचना तो दूर, उसका नाम तक आज तक ढंग से नहीं सुना गया।
फुटेज एंव फ़ोटो-थर्ड पार्टी



