असमतीसरी आंखधर्म और आस्था

शिवसागर में सिंदूर खेला : दशहरे पर मां दुर्गा की विदाई बेला पर खेली जाती है सिंदूर की होली

केशव पारीक

शिवसागर, 2 अक्टूबर 2025/असम.समाचार

आज दशमी तिथि के साथ नवरात्र का पावन पर्व समाप्त हो रहा है। हर साल नवरात्र के अगले दिन असत्य पर सत्य की जीत के रूप में दशहरा उत्सव मनाया जाता है। बंगाली समुदाय इस पर्व को विजयादशमी के तौर पर मनाते हैं और इसी दिन सिंदूर खेला की अनूठी रस्म भी अदा की जाती है। यह बंगाली समुदाय की एक अहम परंपरा है। परंतु आज देश भर में उत्साह से नवरात्र पर देवी प्रतिमा प्रतिष्ठा कर जहां देवी दुर्गा की पूजा अर्चना की जाती है वहीं अब बंगाल की संस्कृति सिंदूर खेला की अनूठी परंपरा भी देश भर की महिलाओं द्वारा अत्यंत ही श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है।

असम के शिवसागर में भी आज विजयादशमी के पवन अवसर पर पूजा पंडालों में महिलाओं ने सिंदूर खेला की अनूठी परंपरा का निर्वाह परंपरागत रूप से किया।

हालांकि इस साल पूरे असम राज्य में ही दुर्गा पूजा का उत्साह फीका फीका सा था। असम के लोगों के दिलों की धड़कन बन चुके उनके प्रिय गायक कलाकार जुबिन गर्ग के असामयिक निधन से शोक में डूबा हुआ है असम।

असम के हर एक पूजा पंडाल में अमृतकंठ जुबिन गर्ग को श्रद्धांजलि अर्पित की गई वहीं आज विजयादशमी के दिन भी लोग अपने प्रिय गायक के गीत जो कि अब असमवासियों के लिए प्रार्थना बन गया है गुनगुनाते नजर आए।

उल्लेखनीय है कि नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना के बाद दशमी पर दशहरे के साथ इस पर्व का समापन हो रहा है। देशभर में नवरात्रि और दशहरे के पर्व को अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। देश भर में इस त्योहारों की धूम देखने को मिलती है।

मूल रूप से सिंदूर खेला बंगाली हिंदू महिलाओं द्वारा दशहरे के दिन मनाया जाता है। इस मौके पर विवाहित महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। परंपरागत रूप से यह रस्म विवाहित महिलाओं के लिए है, जो इस पूरे रीति-रिवाज के साथ मनाती हैं। दरअसल ऐसा माना जाता है कि यह रस्म विवाहित महिलाओं के लिए सौभाग्य लाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति के सुस्वास्थ्य और लंबी उम्र की कमान के साथ देवी दुर्गा के चरणों में सिंदूर अर्पण कर सिंदूर खेला करती है। यह दिन शादीशुदा महिलाओं के लिए बेहद खास होता है और वह साल भर इसका इंतजार करती हैं।

मातारानी के पंडालों में मौजूद लोग एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर दुर्गा पूजा की शुभकामनाएं देते हैं। इसके साथ ही इस रस्म की शुरुआत होती है। इस रस्म के दौरान महिलाएं एक दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और धूमधाम से दुर्गा पूजा का समापन करती हैं। इसी परंपरा को सिंदूर खेला के नाम से जाना जाता है।

बंगाल में ऐसी मान्यता है कि मां दुर्गा दस दिनों के लिए अपने मायके आती हैं और इसी उपलक्ष्य में उनके स्वागत के लिए बड़े-बड़े पंडालों में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती है। वहीं दशमी तिथि के दिन सिंदूर की होली खेल कर मां दुर्गा को विदा किया जाता है।

दुर्गा महोत्सव पर सिंदूर खेला का इतिहास लगभग 450 साल पुराना है। मान्यता है कि जब कोई महिला इस रस्म में हिस्सा लेती है, तो उसका सौभाग्य बना रहता है। यह रस्म महिलाओं की ताकत, एकता, सौहार्द, भाईचारे और शांति का प्रतीक है।

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