दिहिंग पटकाई के जंगलों में छोड़े गए अनाथ काले भालू के शावक
काज़ीरंगा नेशनल पार्क एंड टाइगर रिजर्व से एक सुखद खबर सामने आई है। यहाँ के सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ रिहैबिलिटेशन एंड कंज़र्वेशन (CWRC) में महीनों देखभाल के बाद दो अनाथ एशियाई काले भालू (Ursus thibetanus) के शावकों को दिहिंग पटकाई राष्ट्रीय उद्यान में सफलतापूर्वक छोड़ा गया है। यह असम के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

विकास शर्मा
काज़ीरंगा, 20 अगस्त 2025/असम.समाचार
काज़ीरंगा नेशनल पार्क एंड टाइगर रिजर्व से एक सुखद खबर सामने आई है। यहाँ के सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ रिहैबिलिटेशन एंड कंज़र्वेशन (CWRC) में महीनों देखभाल के बाद दो अनाथ एशियाई काले भालू (Ursus thibetanus) के शावकों को दिहिंग पटकाई राष्ट्रीय उद्यान में सफलतापूर्वक छोड़ा गया है। यह असम के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
जानकारी के मुताबिक, ये शावक इस साल 26 फरवरी को जोरहाट के दिषोई रिज़र्व फॉरेस्ट से बरामद हुए थे। उस समय उनकी उम्र महज चार से छह हफ्ते के बीच आंकी गई थी। स्थानीय युवक द्वारा जंगल में अकेले पाए गए शावकों को पहले नाकचारी बीट ऑफिस, जोरहाट फॉरेस्ट डिवीजन को सौंपा गया। चूंकि उनकी मां का कोई सुराग नहीं मिला, इसलिए दोनों को काज़ीरंगा स्थित CWRC भेजा गया।
साल 2002 में स्थापित CWRC असम वन विभाग, इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफेयर (IFAW) और वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI) की संयुक्त पहल है। यहां विशेषज्ञ डॉक्टर भास्कर चौधरी और उनकी टीम ने शावकों का इलाज कर उन्हें विशेष पोषण दिया। पहले उन्हें कैनाइन मिल्क रिप्लेसर पर पाला गया और धीरे-धीरे जंगल के प्राकृतिक माहौल के अनुरूप ढाला गया ताकि उनमें जंगली प्रवृत्तियां बनी रहें और वे भविष्य में स्वतंत्र रूप से जी सकें।
शावकों को छोड़ने के लिए उपयुक्त स्थान चुनने हेतु वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया गया। हालांकि दिषोई रिज़र्व फॉरेस्ट पर विचार हुआ था, लेकिन वहां मानव बस्तियों की नजदीकी और ज्यादा गतिविधि होने से उसे अनुपयुक्त माना गया। अंततः घने जंगल, प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता और स्थानीय समुदायों के सहयोग को देखते हुए दिहिंग पटकाई राष्ट्रीय उद्यान को चुना गया।
4 जून 2025 को प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, असम द्वारा औपचारिक मंजूरी दी गई। इसके बाद 17 अगस्त को CWRC की टीम ने दोनों शावकों को दिहिंग पटकाई के जंगलों में छोड़ा।
इन भालू शावकों की यात्रा
जोरहाट से बचाव, काज़ीरंगा में देखभाल और अंततः दिहिंग पटकाई में नई जिंदगी की शुरुआत इस बात का प्रमाण है कि वैज्ञानिक तरीके, जिम्मेदार वन्यजीव प्रबंधन और समुदाय की भागीदारी मिलकर वन्यजीव संरक्षण की दिशा में कितना बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
यह कदम असम की उस बढ़ती प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जिसके तहत हर जीव, चाहे वह अनाथ ही क्यों न हो, को जंगल में स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर दिया जा रहा है।



