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माटी की खुशबू, असम की पहचान: दिल्ली की परेड में चमकेगी धुबड़ी की आशारीकांदी टेराकोटा कला

राजा शर्मा

धुबड़ी 20 जनवरी 2026/असम.समाचार

धुबड़ी जिले की ऐतिहासिक आशारीकांदी टेराकोटा शिल्पकला अब केवल असम या भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि बांग्लादेश, नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी देशों में भी अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी है। इसी गौरवशाली परंपरा को एक नई ऊँचाई मिलने जा रही है, जब आगामी 77वें गणतंत्र दिवस पर यह कला दिल्ली की केंद्रीय परेड में असम के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत होगी।

गणतंत्र दिवस पर “रोड ऑफ ड्यूटी” पर होने वाली भव्य परेड के लिए असम के प्रतीक के तौर पर आशारीकांदी गांव की ऐतिहासिक टेराकोटा आर्ट का चयन किया गया है। इस प्रस्तुति में मोर पंख की आकृतियाँ, हातिमा (हाथी) और पारंपरिक मास्क जैसे कई विशिष्ट टेराकोटा ट्रेड ऑब्जेक्ट्स शामिल होंगे, जो असम की लोकसंस्कृति और आत्मा को दर्शाते हैं।

इस वर्ष गणतंत्र दिवस की थीम “आत्मनिर्भर भारत” और “वंदे मातरम्” है। इन्हीं विषयों के आधार पर केंद्रीय संस्कृति निदेशालय ने धुबड़ी के आशारीकांदी टेराकोटा आर्ट और असम के दूसरे प्रतीक के रूप में माजुली के पारंपरिक मास्क के डिज़ाइन केंद्रीय रक्षा मंत्रालय को भेजे थे। दोनों प्रस्तावों के मूल्यांकन के बाद रक्षा मंत्रालय के विशेषज्ञों ने आशारीकांदी के टेराकोटा शिल्पकारों को ही अंतिम रूप से चुना।

इस संबंध में जानकारी देते हुए एनई-कार्ड्स के संयोजक एवं आशारीकांदी पोस्ट जीआई टैग समिति के आह्वायक बिनय भट्टाचार्य ने बताया कि यह चयन पूरे धुबड़ी जिले और पूर्वोत्तर के लिए गर्व का क्षण है। जैसे ही यह खबर जिले में पहुँची, धुबड़ी के गांव-गांव में खुशी की लहर दौड़ गई।

आशारीकांदी गांव के शिल्पकारों का कहना है कि वे पूरी तैयारी के साथ गणतंत्र दिवस के मंच के जरिए अपनी माटी की कला को विश्व दरबार में प्रस्तुत करने को तैयार हैं।

निखिल पाल, टेराकोटा शिल्पकार: कहते है कि

“हमारे लिए यह सपने जैसा है। पीढ़ियों से जो माटी की कला हम सहेजते आए हैं, वह अब दिल्ली की परेड में दिखेगी। इससे हमारी पहचान पूरी दुनिया तक पहुँचेगी।”

बिनय भट्टाचार्य, चेयरपर्सन, पोस्ट जीआई टैग कमेटी, आशारीकांदी ने कहा कि

“आत्मनिर्भर भारत की थीम के अनुरूप आशारीकांदी टेराकोटा का चयन हुआ है। यह केवल एक कला नहीं, बल्कि असम की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिनिधित्व है।”

माटी से गढ़ी गई ये आकृतियाँ अब दिल्ली की राजपथ पर असम की कहानी कहेंगी परंपरा, श्रम और स्वाभिमान की कहानी।

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