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असम की पांडुलिपि धरोहर के संरक्षण से मजबूत होगी सांस्कृतिक विरासत: राज्यपाल

राज्यपाल ने असम राज्य अभिलेखागार, कामरूप अनुसंधान समिति, गुवाहाटी विश्वविद्यालय, कॉटन विश्वविद्यालय, श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र और वैष्णव सत्रों की भूमिका की सराहना की। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति भवन के ग्रंथ कुटीर में संरक्षित पांच दुर्लभ असमिया सांचीपात पांडुलिपियां असम की विरासत को राष्ट्रीय मान्यता मिलने का प्रतीक हैं।

विकास शर्मा,संवाददाता

गुवाहाटी, 30 जनवरी 2026/असम.समाचार

असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने आज गुवाहाटी विश्वविद्यालय के फणिधर दत्ता सेमिनार हॉल में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला ‘असम की पांडुलिपियां’ का उद्घाटन किया। यह कार्यशाला ‘राज्यपाल असम भाषा प्रोत्साहन योजना, 2025’ के अंतर्गत आयोजित की गई है, जिसे लोक भवन, असम द्वारा राज्य की समृद्ध भाषाई एवं साहित्यिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से परिकल्पित किया गया है।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए राज्यपाल श्री आचार्य ने कहा कि पांडुलिपियां ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत की अमर वाहक होती हैं। उन्होंने संस्कृत सूक्ति “नास्ति विद्या समं चक्षुः” का उल्लेख करते हुए कहा कि ज्ञान से बढ़कर कोई दृष्टि नहीं होती और पांडुलिपियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी ऋषि-मुनियों, संतों और समाज की चेतना को संजोए रखती हैं।

राज्यपाल ने प्राचीन कामरूप से लेकर अहोम काल तक असम की चित्रित ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्कृत, प्राचीन असमिया और ताई-अहोम भाषाओं में उपलब्ध पांडुलिपियां राज्य की बहुभाषी-बहुसांस्कृतिक पहचान को प्रतिबिंबित करती हैं। श्रीमंत शंकरदेव और श्री माधवदेव की रचनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ये पांडुलिपियां सामाजिक समरसता, करुणा और मानवीय गरिमा के शाश्वत संदेश देती हैं, वहीं अहोम काल का इतिहास लेखन एक वैज्ञानिक और विशिष्ट परंपरा को दर्शाता है।

डिजिटल युग में संरक्षण के महत्व पर जोर देते हुए राज्यपाल ने कहा कि लोक भवन की भाषा प्रोत्साहन पहल भाषाई सौहार्द और सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य कर रही है। हाल ही में प्रकाशित असमिया और तमिल देशभक्ति कविताओं के अनुवादित संकलन का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि अब इस पहल को गुवाहाटी विश्वविद्यालय के सहयोग से प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपराओं के संरक्षण और प्रसार तक विस्तारित किया गया है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कथन “भारत की विरासत भविष्य की ओर जाने वाला सेतु है” का हवाला देते हुए राज्यपाल ने ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ का उल्लेख किया, जिसके तहत देशभर में अब तक 52 लाख से अधिक पांडुलिपियों का दस्तावेजीकरण किया जा चुका है, जिसमें असम का योगदान उल्लेखनीय है।

राज्यपाल ने असम राज्य अभिलेखागार, कामरूप अनुसंधान समिति, गुवाहाटी विश्वविद्यालय, कॉटन विश्वविद्यालय, श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र और वैष्णव सत्रों की भूमिका की सराहना की। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति भवन के ग्रंथ कुटीर में संरक्षित पांच दुर्लभ असमिया सांचीपात पांडुलिपियां असम की विरासत को राष्ट्रीय मान्यता मिलने का प्रतीक हैं।

उन्होंने विद्वानों, शिक्षाविदों और समाज से पांडुलिपि संरक्षण में सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया तथा आशा व्यक्त की कि यह कार्यशाला तकनीकी प्रशिक्षण, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और भविष्य के सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण मंच सिद्ध होगी।

कार्यक्रम में राज्यपाल के आयुक्त एवं सचिव एस.एस. मीनाक्षी सुंदरम, सलाहकार डॉ. हरबंस दीक्षित, ओएसडी प्रो. बेचन लाल, गुवाहाटी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नानी गोपाल महंत, ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक अध्ययन निदेशालय की निदेशक डॉ. संगीता गोगोई, पुरातत्व निदेशालय की निदेशक डॉ. दीपी रेखा कौल सहित शिक्षक, शोधार्थी और अन्य गणमान्य उपस्थित रहे।

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