
राष्ट्रीय डेस्क
उदयपुर 7 नवंबर 2025/असम.समाचार
कानोड़ का आसमान उस दिन जैसे दो बिल्कुल अलग रंगों में बंट गया था एक तरफ सपनों का सूरज चमका था और दूसरी तरफ जीवन की शाम उतर आई थी। रीमी कोठारी ने सीए फाइनल में ऑल इंडिया 31वीं रैंक हासिल की थी। उदयपुर ज़िले में पहला स्थान वो भी उसी बेटी ने, जिसकी डायरी के हर पन्ने पर सिर्फ एक नाम लिखा था पापा का सपना।
लेकिन यह खुशी उस दरवाज़े पर दस्तक देने आई, जिसके भीतर मातम पसरा था।
आईसीएआई ने परिणाम जारी किए, सोशल मीडिया पर मैसेजों की बारिश, दोस्तो और शिक्षकों के चेहरे पर गर्व की चमक… मगर उसी वक्त रीमी अपने पिता राहुल कोठारी के पार्थिव शरीर के पास बैठी थी। हवा में अगरबत्ती की खुश्बू थी, आँखों में धुआँ और गले में एक ही वाक्य अटका हुआ
“मैं सीए बन गई पापा… सुन रहे हो ना?”
वो पिता, जो बेटी के हर संघर्ष में ढाल, हर नोट्स में प्रेरणा, हर असफलता में सहारा थे उस खबर के आने से कुछ मिनट पहले ही मौन हो गए।
बाहर मिठाइयाँ बँट रही थीं। अंदर किसी की दुनिया।
शहर की सड़कों पर खबर बिजली की तरह फैल गई। युवा व्यवसायी राहुल कोठारी का हार्ट अटैक से निधन और उसी दिन उनकी बेटी का सीए बनने का सपना पूरा। लोग सन्न थे। कईयों ने आँसू पोंछे, कई खामोश खड़े रहे। अंतिम यात्रा में कदमों की आहट थी, पर दिलों में सिर्फ एक सवाल
ज़िंदगी इतनी नाटकीय क्यों होती है?
रीमी पिता के हाथ को कसकर थामे थी, जैसे पुकार रही हो कि शायद स्पर्श ही आवाज़ बन जाए.
“पापा, आपने कहा था न… कर दिखाओ। मैंने कर दिखाया। अब एक बार बोलो “शाबाश बेटा।”
बहुत लोग थे उसे संभालने को, मगर उस क्षण उसे सिर्फ एक सीने की तलाश थी वो जो अब हमेशा के लिए स्मृतियों में रह गया।




