
विकास शर्मा
गुवाहाटी 19 सितंबर 2025/असम.समाचार
असम का आसमान इन दिनों भारी है। हर गली, हर चौक, हर दिल में बस एक ही नाम गूंज रहा है जुबिन गर्ग। वह कलाकार, जिसने गानों के जरिए हजारों-लाखों दिलों को अपनी धुन पर झूमाया, अब खामोश है। लेकिन उनकी खामोशी ने ही लोगों के भीतर एक अनकही पुकार जगा दी है।
दिलचस्प यह है कि जुबिन को याद करने का अंदाज़ भी बिल्कुल अलग है। राजस्थान फाउंडेशन के असम एवं नॉर्थ ईस्ट चैप्टर ने एक अपील की है “दाह संस्कार के दिन दुकानें बंद रखो, यही होगी सच्ची श्रद्धांजलि।” यह कोई सरकारी आदेश नहीं, बल्कि एक सामूहिक भावना है, जिसे समाज ने तुरंत अपना लिया।
युवाओं की आंखों में आंसू हैं, लेकिन उनके होंठ अब भी जुबिन के गाने गुनगुना रहे हैं। यही विरोधाभास उन्हें और भी ज़िंदा बनाए हुए है। व्यापारियों से लेकर कलाकारों तक, संस्थाओं से लेकर आम जनता तक सभी मानते हैं कि दुकानों के शटर गिराना सिर्फ़ ‘बंद’ नहीं होगा, बल्कि उस शख्सियत को सलाम होगा जिसने असम को वैश्विक संगीत नक्शे पर चमकाया।
जुबिन चले गए, मगर शायद यही उनका जादू है कि उनकी अनुपस्थिति भी समाज को एक साथ खड़ा कर रही है।




