पांच दशकों तक काजीरंगा नेशनल पार्क की सेवा करने वाली हथिनी ‘मोहनमाला’ का निधन
मोहनमाला के निधन के साथ काज़ीरंगा ने न केवल एक विभागीय हाथिनी खोई है, बल्कि एक साथी, एक बाढ़कालीन रक्षक और साहस व निष्ठा की मिसाल भी। उनकी स्मृतियाँ और योगदान काज़ीरंगा के इतिहास में सदैव अमर रहेंगे।

विकास शर्मा
काज़ीरंगा, 17 अगस्त 2025/असम.समाचार
काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान एवं टाइगर रिज़र्व ने आज अपनी सबसे भरोसेमंद और ऐतिहासिक विभागीय हथिनी मोहनमाला के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। 70 से 80 वर्ष की आयु में मोहनमाला ने कोहरा रेंज में अंतिम सांस ली।
काज़ीरंगा परिवार से उनका जुड़ाव वर्ष 1970 से था, जब उन्हें कामरूप से लाकर पार्क में शामिल किया गया था। तत्कालीन प्रधान मुख्य वन संरक्षक दुर्गा प्रसाद निओग के कार्यकाल में लायी गयी इस हाथिनी ने पांच दशकों तक पार्क की सेवा की।
निर्भीक, आज्ञाकारी और सहज स्वभाव वाली मोहनमाला अपनी तैराकी की अद्भुत क्षमता और बाढ़ के दिनों में बेजोड़ सहयोग के लिए जानी जाती थीं। जब नावें भी बेकार साबित होतीं, तब मोहनमाला की पीठ पर सवार होकर वनकर्मी अपने गश्ती कार्यों को अंजाम देते थे।
उन्होंने विभिन्न रेंजों में सेवाएँ दीं और कई अवैध शिकार विरोधी अभियानों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सेवा काल के दौरान मोहनमाला ने दो मादा शावकों को जन्म दिया मालती, जो मात्र 17 वर्ष की आयु में चल बसी, और एक अन्य जिसे जन्म के तीन दिन बाद ही बाघ ने मार दिया। मोहनमाला ने वर्ष 2003 में सक्रिय सेवा से संन्यास लिया।
उनके महावत किरण राभा द्वारा सुनाया गया एक संस्मरण आज भी सबके दिलों में जीवित है। एक सुबह मिहीबील क्षेत्र में गश्त के दौरान जब एक जंगली नर हाथी ने उन पर हमला किया, तब मोहनमाला ने अपने महावत और बछिया मालती की रक्षा करते हुए गहरे जल में छलांग लगाई और उन्हें सुरक्षित पार पहुंचाया। घटना के बाद वह एक माह तक लापता रहीं, लेकिन अंततः अपनी बछिया के साथ सुरक्षित लौट आईं।
मोहनमाला के निधन के साथ काज़ीरंगा ने न केवल एक विभागीय हाथिनी खोई है, बल्कि एक साथी, एक बाढ़कालीन रक्षक और साहस व निष्ठा की मिसाल भी। उनकी स्मृतियाँ और योगदान काज़ीरंगा के इतिहास में सदैव अमर रहेंगे।