असम.समाचार(स्पेशल)

असम में छोटे चाय उत्पादक भारी घाटे की चपेट में, हरी पत्तियों की कीमतों में गिरावट से संकट गहराया

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले ये छोटे चाय उत्पादक अगर ऐसे ही घाटे में डूबते रहे, तो बोरसोला क्षेत्र में रोजगार और आजीविका का संकट और गहराने की आशंका है

हरेन भूमिज

ढेकियाजुली 7 अगस्त 2025/असम.समाचार

असम के सोनितपुर जिले के बोरसोला क्षेत्र में हजारों छोटे चाय उत्पादकों को इस समय भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। हरी चाय की पत्तियों की कीमतों में अचानक आई गिरावट और उत्पादन में आई भारी कमी ने इन किसानों की कमर तोड़ दी है।

करीब 2,000 से अधिक छोटे चाय उत्पादक अब अपने भविष्य को लेकर गहरी चिंता में हैं। किसानों का कहना है कि मार्च से जून के बीच वर्षा सामान्य से काफी कम हुई, जिससे चाय की पैदावार पर प्रतिकूल असर पड़ा। इसके साथ ही बाजार में हरी पत्तियों की कीमत घटकर मात्र ₹16 से ₹17 प्रति किलोग्राम रह गई है, जिससे लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है।

गारुडुबा, तेलियागांव, चेंगाहीलो, होजाई गांव, बालिजान, ढोलागुरी, भोङ्गामंदिर, बोरझार, धीराई माजुली और धीराईमुख जैसे इलाकों में फैले ये छोटे चाय बागान पूरी तरह इस संकट की चपेट में हैं।

किसानों का आरोप है कि क्षेत्र के विभिन्न बॉट लीफ फैक्ट्रियों (BLFs) को चाय पत्तियां सप्लाई करने के बावजूद उन्हें उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। रासायनिक खाद, कीटनाशक और मजदूरी की बढ़ती लागत के बीच अब खेती घाटे का सौदा बन गई है।

बोरसोला के किसान इंद्रागिरी सैनासी ने कहा,

“अब हालत ऐसी हो गई है कि पत्तियां तोड़ने से भी घाटा हो रहा है। हम कब तक नुकसान सहें”?

वहीं एक अन्य किसान खेमराज खरेल ने बताया,

“सप्लाई देने के बाद भी दाम नहीं मिल रहे। मजबूरी में कई किसानों ने पत्तियां तोड़नी ही बंद कर दी हैं।”

कई किसानों ने विरोधस्वरूप पत्तियों की तुड़ाई बंद कर दी है। अब उनकी उम्मीद सिर्फ सरकार और टी बोर्ड ऑफ इंडिया से है। किसानों ने दोनों से तत्काल हस्तक्षेप कर राहत पैकेज की मांग की है, ताकि वे इस मुश्किल दौर से बाहर निकल सकें।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले ये छोटे चाय उत्पादक अगर ऐसे ही घाटे में डूबते रहे, तो बोरसोला क्षेत्र में रोजगार और आजीविका का संकट और गहराने की आशंका है।

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